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कला की शिक्षा केवल पुस्तकों और कक्षा की दीवारों तक सीमित नहीं होती।एक

बी.एफ.ए. विभाग, एक्सिस कॉलेज, कानपुर
दिनांक – 31/07/2025

कला की शिक्षा केवल पुस्तकों और कक्षा की दीवारों तक सीमित नहीं होती।एक

कलाकार का हृदय तब पूरी तरह जागृत होता है, जब वह अपने अनुभवों को धरातल पर, इतिहास के गर्भ में, और रंगों की धड़कनों में महसूस करता है।इसी

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उद्देश्य से बी.एफ.ए. विभाग, एक्सिस कॉलेज, कानपुर द्वारा पिछले दिनों राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जयपुर की ओर एक शैक्षणिक यात्रा का आयोजन किया गया।यह

यात्रा, एक सामान्य भ्रमण मात्र नहीं थी, बल्कि छात्रों ने कला को इतिहास की धूल में, किलों की दीवारों पर, और संग्रहालयों की खामोश रेखाओं में जीकर देखा।

यात्रा का विवरण : वह शहर जहाँ हर इमारत, हर मोड़, हर छतरी, हर झरोखा कुछ कहता है।जब

छात्रों का समूह इस गुलाबी शहर में पहुँचा, तो पहली सुबह ही अल्बर्ट हॉल संग्रहालय ने हमें अपनी बाँहों में भर लिया।

यहाँ राजस्थानी, मुग़ल, कांगड़ा और फारसी चित्रकला शैलियों की झलकियाँ देखते हुए छात्र न केवल पेंटिंग्स के सौंदर्यबोध को समझ रहे थे, बल्कि इतिहास की परतों को भी छू रहे थे।

छात्रों ने यहाँ मिनिएचर पेंटिंग्स, हथियार, पोशाकें, और कलात्मक शिल्प का अवलोकन किया।उन्होंने

प्रकाश संयोजन, क्यूरेशन और कलात्मक प्रदर्शनी के व्यावहारिक पक्षों को समझा। यहाँ की एक विशेष कड़ी रही – मिस्र की प्राचीन ममी “Tutu” का दर्शन। यह ममी अल्बर्ट हॉल की गैलरी संख्या 5 में संरक्षित है, और इसे 1887 में मिस्र से लाकर संग्रहालय में स्थापित किया गया था। यह ममी एक मिस्री महिला “Tutu” की है, जो 332 ईसा पूर्व से पहले के कालखंड की मानी जाती है। इस ममी के साथ-साथ प्राचीन मिस्र की दफन परंपराएं, मरणोपरांत जीवन की अवधारणाएँ, तथा उनके धार्मिक प्रतीकों को भी दर्शाया गया है।यह

ममी न केवल एक ऐतिहासिक अवशेष है, बल्कि कला, विज्ञान और विश्वास की त्रिवेणी को भी प्रकट करती है।छात्रों

के लिए यह अनुभव, जीवन और मृत्यु की मिथकीय कलाओं को समझने का एक अनूठा अवसर था।

इसके बाद नाहरगढ़ किला छात्रों के रचनात्मक अवलोकन का केंद्र बना। पहाड़ियों पर बसा यह किला, जयपुर की गोद में बैठा हुआ एक विशाल कैनवास है, जिस पर इतिहास अपनी रंगत भरता है।यहाँ

के कक्ष, गलियारे और चित्रित दीवारें छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।

सिटी पैलेस परिसर का भव्य द्वार – छात्रों ने यहाँ भित्तिचित्रों, स्थापत्य शैली और दीवार चित्रण की समृद्ध परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव किया।आमेर किले की यात्रा, स्थापत्य कला की दृष्टि से विशेष रही।

शीश महल के प्रतिबिंबों में छात्रों ने प्रकाश और सतह के मध्य संबंध को देखा। भित्तिचित्रों और रंगों की परंपरा ने उनके भीतर के चित्रकार को और भी गहराई से जगा दिया।

राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर – इसके पश्चात छात्र पहुँचे राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट, जहाँ उन्हें अपने जैसे युवा कलाकारों के बीच रचनात्मकता की ऊर्जा महसूस हुई।एक

जीवंत कला संस्थान जहाँ छात्रों ने प्रिंटमेकिंग, स्कल्पचर स्टूडियोज़ और जीवन अध्ययन सत्रों का अवलोकन किया।शिक्षकों

के साथ संवाद में आधुनिक कला शिक्षा की झलक मिली। इस संस्थान में छात्रों ने स्टूडियोज़ में काम देखे, कक्षा-सत्रों में चल रही स्केचिंग की प्रक्रिया को महसूस किया और देखा कि कैसे एक विचार, एक आकृति में तब्दील होता है।

जवाहर कला केंद्र – जयपुर अपने आप मे एक ऐसा महानगर है जो कि प्राचीन विरासतों और सांस्कृतिक धरोहरों को अपनी बाहों मे समेटे हुए है जिसमे जवाहर कला केंद्र भी शहर का एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र है जहां कई प्रकार कलाओं का समावेश मिलता है यहाँ चित्रकला, नाट्य कला, मूर्तिकला, साहित्यकला इत्यादि के कई दिग्गज कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते रहते हैं यहाँ पर सभी विद्यार्थी गण उन महान कलाकारों से मिले और उन कलाकारों ने भी अपने अनुभवों को विद्यार्थियों के साथ साजा किया । जयपुर स्थित यह बहुकलाकेन्द्र है जिसका उद्देश्य राजस्थानी कला संस्कृति और शिल्प को संरक्षित करना है इस भवन का डिजाइन प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया के द्वारा 1986 मे डिजाइन किया था और 1992 और 1993 के बीच बनकर तैयार हुआ । इसके डिजाइन का आधार वैदिक ज्योतिषीय सिद्धांत “नवगृह” पर आधारित नव-मण्डल संरचना है ।

आमेर का किला – इसी क्रम मे आमेर का किला भी जयपुर की ऐतिहासिक वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है आमेर किले की भित्ति चित्रकारी, जाली कार्य, मीनाकारी और रंगों का संयोजन छात्रों को विशेष रूप से आकर्षित कर गया। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककला के दर्शन ने उनकी कलात्मक समझ को समृद्ध किया। आमेर किला भ्रमण से छात्रों को पारंपरिक भारतीय स्थापत्य एवं चित्रकला की विविधता का गहन अनुभव प्राप्त हुआ, जिससे उनके रचनात्मक कौशल और कलात्मक दृष्टि का विस्तार हुआ।

यात्रा के अंतिम दिन, जब समय कुछ ठहर सा गया था, समूह पत्रिका गेट पहुँचा। जयपुर की इस वास्तुकला की भव्यता को देखकर छात्रों ने वहीं बैठकर स्केचबुक खोल ली। गुलाबी और नीले रंगों की जटिलता, गेट की सूक्ष्मता और छायाओं के खेल ने उन्हें रेखांकन के लिए विवश कर दिया। यहाँ पर पत्रिका गेट पर छात्रों ने स्केचिंग भी किया, जो इस भ्रमण का सबसे आत्मीय और रचनात्मक क्षण बन गया।
इस संपूर्ण यात्रा के दौरान छात्र केवल दर्शक नहीं थे, वे सृजनकर्ता भी थे। उन्होंने फोटो खींचे, नोट्स लिखे, रेखाचित्र बनाए और आपसी संवादों से अपने अनुभवों को समृद्ध किया। कला की परंपरा और समकालीनता के इस संगम ने उनमें दृष्टि, संवेदना और विश्लेषण की क्षमता का विस्तार किया।

यह यात्रा एक स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवन का हिस्सा बन गई है। एक ऐसा अनुभव, जो शायद उनके भावी चित्रों, मूर्तियों और विचारों में बार-बार लौटकर आएगा – रंग बनकर, रेखा बनकर या किसी मौन प्रतीक के रूप में। इस यात्रा में डायरेक्टर डा० आशीष मलिक एवं विभागाध्यक्ष श्रीमती पलक पटेल का अमूल्य सहयोग रहा एवं ट्रिप में शिक्षकगण श्री अमरेन्द्र श्रीवास्तव, श्रीमती प्राची शर्मा ने छात्रों का मार्गदर्शन किया ।

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